TET अनिवार्यता के खिलाफ देशभर के 25 लाख शिक्षक एकजुट, जुलाई में स्कूलों में तालाबंदी की चेतावनी
TET 2026: शिक्षक आंदोलन ने पकड़ी रफ्तार, सरकार और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर उठे सवाल
देशभर के प्राथमिक शिक्षकों के बीच इन दिनों शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को लेकर असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के शिक्षक संगठनों ने टीईटी को अनिवार्य किए जाने और इसे पुरानी तिथि यानी बैक डेट से लागू करने के फैसले का कड़ा विरोध शुरू कर दिया है। इस मुद्दे को लेकर अब आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच चुका है। शिक्षकों का कहना है कि वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों पर अचानक नई शर्तें लागू करना उनके भविष्य और रोजगार दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन गया है।
उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ ने इस मामले को लेकर बड़ा अभियान छेड़ने का ऐलान किया है। संघ ने “जनप्रतिनिधि चुप्पी तोड़ो” अभियान शुरू करने की घोषणा की है, जिसके तहत शिक्षक अपने क्षेत्र के सांसदों और विधायकों से सीधे सवाल पूछेंगे। संगठन का दावा है कि इस अभियान में देशभर के लगभग 25 लाख शिक्षक शामिल होंगे। शिक्षकों का आरोप है कि उनके भविष्य से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर सरकार और जनप्रतिनिधि खुलकर कोई स्पष्ट रुख नहीं अपना रहे हैं, जिससे शिक्षकों में नाराजगी लगातार बढ़ रही है।
शिक्षक संगठनों का कहना है कि न्यायालय के फैसले के बाद भी सरकार की ओर से पर्याप्त राहत नहीं दी गई है। उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ के पदाधिकारियों का मानना है कि लंबे समय से विद्यालयों में सेवाएं दे रहे शिक्षकों को अचानक टीईटी की अनिवार्यता के दायरे में लाना न्यायसंगत नहीं है। उनका कहना है कि कई शिक्षक ऐसे हैं जिन्होंने अपनी पूरी सेवा शिक्षा के क्षेत्र को समर्पित कर दी है और अब उनके सामने नौकरी को लेकर अनिश्चितता खड़ी हो गई है।
जुलाई में तालाबंदी और कार्य बहिष्कार की चेतावनी
शिक्षक संगठनों ने आंदोलन को और तेज करने के संकेत दिए हैं। संघ के नेताओं ने स्पष्ट कहा है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द विचार नहीं किया गया तो जुलाई महीने में विद्यालयों में तालाबंदी की जाएगी। इसके साथ ही शिक्षक गैर-शैक्षणिक कार्यों का पूर्ण बहिष्कार भी कर सकते हैं। यह चेतावनी ऐसे समय में सामने आई है जब नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत होने वाली है और स्कूलों में विभिन्न प्रशासनिक गतिविधियां चल रही हैं।
शिक्षकों का कहना है कि वे शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित नहीं करना चाहते, लेकिन जब उनके रोजगार पर ही संकट मंडराने लगे तो उन्हें आंदोलन का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। उनका मानना है कि यह केवल एक परीक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि लाखों परिवारों के भविष्य का सवाल है। इसलिए सरकार को जल्द से जल्द इस विषय पर स्पष्ट और सकारात्मक निर्णय लेना चाहिए।
आखिर क्या है पूरा मामला?
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने पहली से आठवीं कक्षा तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) उत्तीर्ण करना अनिवार्य माना है। हाल ही में अदालत ने टीईटी पास करने की समय सीमा बढ़ाते हुए 31 अगस्त 2028 तक का अवसर दिया है। हालांकि जिन शिक्षकों की सेवा अवधि में पांच वर्ष या उससे कम समय शेष है, उन्हें इस अनिवार्यता से छूट प्रदान की गई है।
इसके बावजूद बड़ी संख्या में शिक्षक इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। उनका तर्क है कि जिन शिक्षकों की नियुक्ति उस समय की नियमावली के अनुसार हुई थी, उनके लिए बाद में नई शर्तें लागू करना उचित नहीं है। शिक्षकों का मानना है कि यदि नियुक्ति के समय टीईटी अनिवार्य नहीं थी तो वर्षों बाद उसे रोजगार से जोड़ना न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
राज्य अध्यापक पुरस्कार को लेकर भी बढ़ा असमंजस
टीईटी विवाद का असर अब राज्य अध्यापक पुरस्कार की प्रक्रिया पर भी दिखाई देने लगा है। कई जिलों में पुरस्कार के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू होने वाली है, लेकिन शिक्षकों के बीच इसे लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। अनेक शिक्षक सवाल उठा रहे हैं कि जब उनकी सेवा और पात्रता को लेकर ही अनिश्चितता बनी हुई है, तब राज्य स्तर के सम्मान के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू करने का क्या औचित्य है।
शिक्षकों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि यदि भविष्य में टीईटी अनिवार्यता के कारण किसी की नौकरी प्रभावित होती है तो पुरस्कार प्राप्त करने वाले शिक्षकों की स्थिति क्या होगी। इसके अलावा यह भी सवाल उठ रहा है कि पहले से पुरस्कार प्राप्त कर चुके शिक्षकों को मिलने वाले सेवा विस्तार का लाभ भविष्य में जारी रहेगा या नहीं। इन सभी मुद्दों पर अभी तक स्पष्ट दिशा-निर्देश सामने नहीं आए हैं, जिससे असमंजस और बढ़ गया है।
शिक्षकों की मांगें क्या हैं?
शिक्षक संगठनों की प्रमुख मांग है कि टीईटी अनिवार्यता को बैक डेट से लागू न किया जाए। उनका कहना है कि पहले से कार्यरत शिक्षकों को सेवा सुरक्षा प्रदान की जाए और उनकी नियुक्ति के समय लागू नियमों के आधार पर ही उनकी पात्रता तय की जाए। इसके अलावा सरकार शिक्षकों के हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसा समाधान निकाले जिससे शिक्षा व्यवस्था भी प्रभावित न हो और लाखों शिक्षकों का भविष्य भी सुरक्षित रह सके।
शिक्षकों का मानना है कि यदि सरकार और जनप्रतिनिधि समय रहते इस विषय पर संवाद स्थापित करते हैं तो विवाद का समाधान निकाला जा सकता है। लेकिन यदि लंबे समय तक चुप्पी बनी रही तो आंदोलन और अधिक व्यापक रूप ले सकता है।