जब शब्दों से दर्द नहीं निकला,तो फंदा बोल उठा

जब शब्दों से दर्द नहीं निकला,तो फंदा बोल उठा

 

बाराबंकी। इतना मजबूत खुद को बना लूंगी मैं… कोई कुछ भी करे, फर्क ही ना पड़े…। कुछ भी जब में किसी से ना कह पाती हूं, तब कलम मेरी वाणी बन जाती है…। ये पंक्तियां अच कचिता नहीं रहीं। ये उस अपमान और मानसिक पीड़ा की आखिरी चीख बन चुकी हैं, जिसे हरख ब्लॉक के उधत्वापुर स्थित कंपोजिट विद्यालय की शिक्षिका उमा वर्मा वर्षों से डोल रही थीं।

 

वही उमा वर्मा, जिनका शव प्रधानाध्यापक कक्ष में फंदे से लटका मिला और जिनकी मौत के बाद उनके व्हाट्सएप स्टेटस पर लिखी कविताएं पूरे जीवन और संघर्ष को बयां कर रही हैं

बात वर्ष 2008 की है। बेसिक शिक्षा विभाग में नौकरी जॉइन करने बाली उमा वर्मा की तैनाती वर्ष 2019 में उधवापुर के कंपोजिट विद्यालय में हुई। सहायक अध्यापक होने के बावजूद वह सिर्फ किताबें नहीं पढ़ाती थीं, वह चच्चों में सोचने, गढ़ने और सपने देखने की क्षमता विकसित करती थीं।

 

अक्तूबर 2025 में उन्होंने कपड़ा प्रेस करने वाले राम महेश के पुत्र छात्र कृष्णा कनौजिया को गाइड किया। महज 200 की लागत से रोशनदान को खोलने और बंद करने का सिस्टम विकसित कर दिया। इंस्पायर अवार्ड योजना में राष्ट्रीय स्तर के लिए मॉडल चयनित हुआ। लखनऊ में जब मॉडल की प्रस्तुति हुई, तो सामने खुद योगी सीएम आदित्यनाथ मौजूद थे।

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