जनगणना ड्यूटी में खप गईं छुट्टियां, अब कब मिलेगा सुकून?

जनगणना ड्यूटी में खप गईं छुट्टियां, अब कब मिलेगा सुकून?

गर्मी की छुट्टियां आते ही हर शिक्षक के मन में एक सुकून होता है। साल भर की भागदौड़ के बाद यही कुछ दिन ऐसे होते हैं, जब इंसान खुद के लिए जी पाता है। लेकिन इस बार तस्वीर थोड़ी अलग दिख रही है।

इस बार छुट्टियां आईं जरूर हैं, लेकिन राहत लेकर नहीं आईं।

छुट्टी कम, जिम्मेदारी ज्यादा

कई जिलों में शिक्षकों को ग्रीष्मावकाश के दौरान ही जनगणना कार्य में लगा दिया गया है। सुबह से शाम तक घर-घर जाकर जानकारी जुटाना, फॉर्म भरना, डेटा संभालना—ये सब काम अब छुट्टियों के दिनों में ही पूरे करने हैं।

सीधी बात करें तो इस बार “छुट्टी” शब्द सिर्फ कैलेंडर तक सीमित रह गया है।

मन में थकान, चेहरे पर जिम्मेदारी

शिक्षकों की स्थिति थोड़ी समझने वाली है। एक तरफ परिवार की उम्मीदें होती हैं—कि इस बार कुछ समय साथ बिताया जाएगा। दूसरी तरफ सरकारी जिम्मेदारी, जिसे टाला भी नहीं जा सकता।

ऐसे में शिक्षक ना पूरी तरह आराम कर पा रहे हैं, ना ही खुलकर शिकायत कर पा रहे हैं। बस चुपचाप अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं।

छुट्टियों का असली मतलब ही बदल गया

पहले जहां छुट्टियों का मतलब होता था—आराम, रिश्तेदारों से मिलना, या कहीं घूम आना… अब वही समय फील्ड वर्क में निकल रहा है।

कई शिक्षक मजाक में कहते हैं, “अब छुट्टी नहीं, बस लोकेशन बदल जाती है—स्कूल से फील्ड तक।”

क्या मिल पाएगा संतुलन?

जनगणना जैसे काम देश के लिए जरूरी हैं, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इसके लिए शिक्षकों की छुट्टियों का ही सहारा लेना जरूरी है?

अगर थोड़ा संतुलन बना लिया जाए—जैसे अलग से समय या प्रतिकर अवकाश—तो शायद स्थिति बेहतर हो सकती है।

जनगणना/मकान गणना हेतु शिक्षामित्र एवं अनुदेशकों की ड्रियूटी लगाने के संबंध मे

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