फर्जी प्रमाणपत्र पर नौकरी: शिक्षक को बर्खास्त किया, लेकिन FIR क्यों नहीं? शिक्षा विभाग पर उठे सवाल

फर्जी प्रमाणपत्र पर नौकरी: शिक्षक को बर्खास्त किया, लेकिन FIR क्यों नहीं? शिक्षा विभाग पर उठे सवाल

बेसिक शिक्षा विभाग में फर्जी प्रमाणपत्र के सहारे नौकरी करने का एक मामला इन दिनों चर्चा में है। शिक्षा क्षेत्र रसड़ा के प्राथमिक विद्यालय खड़सरा नंबर एक में तैनात सहायक अध्यापक प्रभास कुमार को सेवा से बर्खास्त किए जाने के बाद भी अब तक प्राथमिकी दर्ज न होने पर सवाल उठ रहे हैं।

शिकायतकर्ता प्रभात राय ने संबंधित शिक्षक के दिव्यांगता प्रमाणपत्र को फर्जी बताते हुए इसकी आधिकारिक जांच की मांग की थी। जांच के तहत बीएचयू, वाराणसी के विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम ने मेडिकल परीक्षण किया, जिसमें सहायक अध्यापक की आंखें पूरी तरह स्वस्थ और 100 प्रतिशत सामान्य पाई गईं। इसके बाद विभागीय स्तर पर कार्रवाई करते हुए शिक्षक को पद से हटा दिया गया।

हालांकि, यहीं से मामला और गंभीर हो गया। शिकायतकर्ता का कहना है कि नियुक्ति की शर्तों के अनुसार यदि कोई प्रमाणपत्र फर्जी पाया जाता है, तो बर्खास्तगी के साथ-साथ तत्काल एफआईआर दर्ज कराना अनिवार्य होता है। इसके बावजूद, बर्खास्तगी को एक माह से अधिक समय बीत जाने के बाद भी पुलिस में कोई तहरीर नहीं दी गई।

इस बीच, हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण आदेश में साफ किया है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नियुक्त शिक्षकों के खिलाफ केवल बर्खास्तगी ही नहीं, बल्कि वेतन की वसूली और आपराधिक मुकदमा दर्ज कराना भी आवश्यक है। इस आदेश के बाद विभागीय भूमिका पर और सवाल खड़े हो गए हैं।

मामले में बेसिक शिक्षा अधिकारी मनीष कुमार सिंह का कहना है कि प्रकरण फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए इस स्तर पर कोई अतिरिक्त कार्रवाई संभव नहीं है। वहीं, शिक्षा जगत में यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि ऐसे मामलों में समय पर कानूनी कार्रवाई नहीं होती, तो इससे व्यवस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता दोनों पर असर पड़ता है।

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