मुर्गा बनाकर छात्रों को डंडों से पीटा, छात्राओं को हाथ ऊपर उठाकर कोने में खड़ा किया, विरोध करने पर, शिक्षक मौके से फरार
मेरठ के एक जूनियर हाईस्कूल से जुड़ा मामला इन दिनों चर्चा में है। यहां कुछ छात्रों को कथित तौर पर मुर्गा बनाकर डंडों से पीटा गया, जबकि छात्राओं को हाथ ऊपर उठाकर दीवार की ओर खड़ा कर दिया गया। घटना का वीडियो सामने आने के बाद मामला तूल पकड़ गया है और ग्रामीणों ने कड़ी आपत्ति जताई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की सजा न सिर्फ अमानवीय है, बल्कि कानून के भी खिलाफ है। घटना के बाद से स्कूल प्रशासन और संबंधित शिक्षक पर सवाल उठ रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
यह घटना मेरठ जिले के फलावदा स्थित एक जूनियर हाईस्कूल की बताई जा रही है, जहां करीब 200 बच्चे पढ़ते हैं। वायरल वीडियो में साफ दिख रहा है कि कुछ बच्चों को स्कूल परिसर में मुर्गा बनाकर रखा गया है, जबकि कुछ छात्राएं हाथ ऊपर करके कोने में खड़ी हैं।
मौके पर मौजूद ग्रामीणों ने जब यह दृश्य देखा तो उन्होंने इसका विरोध किया और वीडियो बनाना शुरू कर दिया। वीडियो में एक महिला यह कहती सुनाई देती है कि बच्चों ने बदतमीजी की थी, इसलिए सजा दी जा रही है। वहीं, एक शिक्षक का कथित बयान सामने आया कि “अगर बच्चे अनुशासन नहीं मानेंगे तो पिटेंगे।”
जब एक व्यक्ति ने बच्चों को पीटने का कारण पूछा, तो जवाब मिला कि ड्रेस को लेकर सजा दी गई है। इस बात ने ग्रामीणों को और नाराज कर दिया।
वीडियो बनाने पर विवाद
वीडियो रिकॉर्डिंग के दौरान माहौल और गरमा गया। एक शिक्षक ने कथित तौर पर कहा कि “वीडियो मुख्यमंत्री पोर्टल पर डाल देना।” इसी बीच बहस भी हुई। शिक्षक ने खुद को एचओडी बताते हुए पूछा कि स्कूल में किसकी अनुमति से आए हो और वीडियो बना रहे व्यक्ति को बाहर जाने को कहा।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर सब कुछ सही था तो वीडियो बनाने पर आपत्ति क्यों की गई?
पुलिस को सूचना, शिक्षक फरार
ग्रामीणों ने 112 नंबर पर कॉल कर पुलिस को सूचना दी। लेकिन पुलिस के मौके पर पहुंचने से पहले ही संबंधित शिक्षक स्कूल छोड़कर चले गए। इस पर भी कई सवाल उठ रहे हैं।
फिलहाल, मामले की जांच को लेकर latest update का इंतजार है। पुलिस और शिक्षा विभाग की ओर से अब तक किसी औपचारिक कार्रवाई की official announcement नहीं हुई है, लेकिन ग्रामीणों ने कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
क्या कहता है कानून? – आरटीई एक्ट 2009
भारत में बच्चों को शारीरिक दंड देना प्रतिबंधित है। Right to Education (RTE) Act 2009 के तहत स्कूलों में किसी भी तरह की corporal punishment पर पूरी तरह रोक है।
इस कानून के मुताबिक:
छात्रों को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित नहीं किया जा सकता।
स्कूल प्रबंधन की जिम्मेदारी है कि बच्चों का सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित करे।
यहां तक कि शिक्षा विभाग की important guidelines में भी स्पष्ट है कि अनुशासन के नाम पर हिंसा स्वीकार्य नहीं है।
अनुशासन और दंड: एक जरूरी सवाल
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि “बच्चों को सुधारने के लिए सख्ती जरूरी है।” लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि डर के बजाय संवाद ज्यादा असरदार होता है।
जैसे घर में माता-पिता समझाकर बात सुलझाते हैं, वैसे ही स्कूल में भी सकारात्मक अनुशासन (positive discipline) की जरूरत होती है। डंडे से शायद चुप्पी मिल जाए, लेकिन सम्मान नहीं।
आगे क्या?
ग्रामीणों ने शिक्षा विभाग से मामले की निष्पक्ष जांच और संबंधित शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो नियमों के तहत कार्रवाई संभव है।
इस मामले में आगे की official details, जांच रिपोर्ट और संभावित एक्शन को लेकर सभी की नजरें प्रशासन पर टिकी हैं।
निष्कर्ष
स्कूल बच्चों के लिए सुरक्षित जगह होनी चाहिए, जहां वे सीखें, आगे बढ़ें और आत्मविश्वास के साथ जीवन की तैयारी करें। अगर वहीं डर और दंड का माहौल बने, तो यह चिंता का विषय है।
मेरठ की यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि कानून केवल कागज पर नहीं, जमीन पर भी लागू होना चाहिए। बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की भी साझा जिम्मेदारी है।