लाखों शिक्षकों ने टीईटी विवाद पर सरकार से हस्तक्षेप मांगा, 2010-11 से पहले नियुक्त शिक्षकों को स्थायी छूट
TET Controversy News: शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को लेकर देशभर में एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। लाखों शिक्षकों के भविष्य से जुड़े इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर अखिल राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने केंद्र और राज्य सरकार से तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि वर्ष 2010 से पहले तथा उत्तर प्रदेश में टीईटी लागू होने से पहले नियुक्त किए गए शिक्षकों को इस अनिवार्यता से स्थायी रूप से छूट दी जानी चाहिए। इस मांग को लेकर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन भी भेजा गया है।
फिरोजाबाद से उठी यह आवाज अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनती जा रही है। शिक्षकों का मानना है कि जिनकी नियुक्ति उस समय के नियमों और मानकों के अनुसार हुई थी, उन्हें बाद में लागू की गई योग्यता के आधार पर प्रभावित करना न्यायसंगत नहीं होगा। यही कारण है कि हजारों नहीं बल्कि लाखों शिक्षक इस मामले में सरकार से स्पष्ट और स्थायी समाधान की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
अखिल राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के जिला अध्यक्ष डॉ. अबोध कुमार चतुर्वेदी और जिला महामंत्री कौशलेंद्र सिंह के नेतृत्व में भेजे गए ज्ञापन में कहा गया है कि शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम की धारा 23(2) में वर्ष 2017 में किए गए संशोधन और उससे जुड़े न्यायिक निर्णयों के बाद शिक्षकों के बीच भ्रम और असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। संगठन का तर्क है कि 23 अगस्त 2010 को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) द्वारा टीईटी को न्यूनतम योग्यता घोषित किए जाने से पहले देश के विभिन्न राज्यों में लाखों शिक्षकों की नियुक्तियां विधिवत और कानूनी रूप से की जा चुकी थीं।
महासंघ का कहना है कि किसी नई योग्यता या नियम को पूर्व प्रभाव से लागू करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ माना जा सकता है। जिन शिक्षकों ने वर्षों पहले नियमानुसार नियुक्ति प्राप्त की और लंबे समय से विद्यालयों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उनके अधिकारों को प्रभावित करना उचित नहीं होगा। संगठन ने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति शिक्षकों के मनोबल को कमजोर कर सकती है और शिक्षा व्यवस्था की स्थिरता पर भी असर डाल सकती है।
ज्ञापन में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि इन शिक्षकों ने वर्षों तक शिक्षा के प्रसार, बच्चों के भविष्य निर्माण और समाज में जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर दूर-दराज के विद्यालयों तक उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया है। ऐसे में उनके अनुभव और योगदान को नजरअंदाज करना न केवल शिक्षकों के लिए बल्कि संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय हो सकता है।
संगठन ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए कहा कि न्यायालय के आदेशों का पालन करना सभी का संवैधानिक दायित्व है। हालांकि, जनहित में आवश्यक नीतिगत और विधायी समाधान तैयार करना सरकार और संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसलिए सरकार को इस संवेदनशील मुद्दे पर सकारात्मक पहल करते हुए ऐसा समाधान निकालना चाहिए जिससे शिक्षकों के अधिकार सुरक्षित रह सकें और शिक्षा व्यवस्था भी प्रभावित न हो।
महासंघ की प्रमुख मांगों में 23 अगस्त 2010 से पूर्व नियुक्त सभी शिक्षकों तथा उत्तर प्रदेश में 27 जुलाई 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से स्थायी रूप से मुक्त करना शामिल है। इसके साथ ही उनकी सेवा, वरिष्ठता, पदोन्नति, वेतनमान और अन्य सभी वैधानिक लाभों को पूर्ण संरक्षण देने की मांग भी उठाई गई है। संगठन का मानना है कि इससे लाखों शिक्षकों के मन में व्याप्त अनिश्चितता समाप्त होगी और वे पूरी निष्ठा के साथ अपने शैक्षिक दायित्वों का निर्वहन कर सकेंगे।
शिक्षकों की निगाहें अब सरकार के फैसले पर
फिलहाल इस पूरे मामले पर शिक्षकों की निगाहें केंद्र और राज्य सरकार के आगामी कदमों पर टिकी हुई हैं। यदि सरकार इस विषय में कोई स्पष्ट नीति या विशेष प्रावधान लाती है, तो इससे लाखों शिक्षकों को बड़ी राहत मिल सकती है। वहीं, यदि समाधान में देरी होती है तो शिक्षकों के बीच असमंजस और चिंता का माहौल बना रह सकता है।