टीईटी और अनुभवी शिक्षकों के संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न
हाल ही में टीईटी के संबंध में दायर रिव्यू पिटीशन पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश के पैरा 33 में कहा है कि टीईटी परीक्षा आयोजित करने में संबंधित प्राधिकरणों को समय लगेगा तथा इसके लिए उपलब्ध संसाधन भी सीमित हैं। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने पूर्व में दी गई समय-सीमा को 2 वर्ष से बढ़ाकर 3 वर्ष कर दिया है। अर्थात अब कार्यरत शिक्षकों को 31 अगस्त 2027 के स्थान पर 31 अगस्त 2028 तक टीईटी योग्यता प्राप्त करनी होगी।
न्यायालय का यह दृष्टिकोण कि बच्चों के भविष्य के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता, निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रत्येक बच्चे का अधिकार है और प्रत्येक शिक्षक भी यही चाहता है। किंतु इस विषय से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी विचारणीय हैं।
❓यदि टीईटी ही एक योग्य शिक्षक का अंतिम पैमाना है, तो 2010 से पूर्व नियुक्त हुए वे हजारों शिक्षक क्या अयोग्य थे जिन्होंने दशकों तक विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान की?
उन्हीं शिक्षकों द्वारा पढ़ाए गए अनेक विद्यार्थी आज आईएएस, पीसीएस, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक तथा अन्य प्रतिष्ठित पदों पर कार्यरत हैं।
❓जब इन शिक्षकों की नियुक्ति हुई थी, तब उन्होंने उस समय की सभी निर्धारित शैक्षिक योग्यताएँ और चयन प्रक्रियाएँ पूर्ण की थीं। यदि समय-समय पर नई योग्यताएँ निर्धारित होती रहें, तो क्या पूर्व में नियुक्त प्रत्येक कर्मचारी को भी नई शर्तों को पूरा करना अनिवार्य किया जाना चाहिए?
❓यह प्रश्न केवल शिक्षकों तक सीमित नहीं है। विभिन्न विभागों में पदोन्नति प्राप्त करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों से क्या वर्तमान समय की सभी नई पात्रताएँ और परीक्षाएँ पुनः उत्तीर्ण करने की अपेक्षा की जाती है?
यदि नहीं, तो केवल शिक्षकों के लिए ही यह व्यवस्था क्यों?
❓सबसे अधिक प्रभावित वे शिक्षक हैं जिनकी आयु 45 से 55 वर्ष के बीच है। किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए पर्याप्त समय, एकाग्रता और निरंतर अध्ययन की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर शिक्षकों को शिक्षण कार्य के अतिरिक्त जनगणना, चुनाव ड्यूटी, बीएलओ कार्य, सर्वेक्षण तथा अन्य प्रशासनिक दायित्व भी निभाने पड़ते हैं। ऐसे में उनके पास परीक्षा की तैयारी के लिए पर्याप्त समय कहाँ है?
❓ माननीय सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार यदि बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता, तो फिर शिक्षकों को लगातार गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाकर शिक्षण कार्य से दूर क्यों रखा जाता है?
❓जब स्वयं माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्वीकार किया है कि टीईटी परीक्षा आयोजित कराने में समय और संसाधनों की सीमाएँ हैं, तब क्या वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों को तैयारी के लिए पर्याप्त अवसर, प्रशिक्षण, अध्ययन अवकाश तथा आवश्यक शैक्षिक सहयोग उपलब्ध नहीं कराया जाना चाहिए?
शिक्षक केवल एक कर्मचारी नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के भविष्य का निर्माता होता है। यदि वही शिक्षक मानसिक तनाव, असुरक्षा और अनिश्चितता से घिरा रहेगा, तो उसका प्रभाव शिक्षा व्यवस्था पर भी पड़ेगा।
इसलिए सरकार और नीति-निर्माताओं का दायित्व है कि वे अनुभवी शिक्षकों की परिस्थितियों को समझते हुए ऐसा संतुलित समाधान निकालें, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता भी बनी रहे और वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों का सम्मान भी सुरक्षित रहे।
शिक्षकों का उद्देश्य कभी भी शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता करना नहीं रहा है। उनकी अपेक्षा केवल इतनी है कि उनके अनुभव, सेवा और वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए न्यायसंगत, व्यावहारिक और मानवीय समाधान खोजा जाए।