शिक्षामित्रों के मानदेय पर सरकार संवेदनशील : संदीप सिंह 

शिक्षामित्रों के मानदेय पर सरकार संवेदनशील : संदीप सिंह 

update—विधान परिषद में शिक्षामित्रों के मानदेय को लेकर सरकार की ओर से महत्वपूर्ण बयान सामने आया है। बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संदीप सिंह ने कहा कि सरकार इस मुद्दे पर पूरी तरह संवेदनशील है और मानदेय बढ़ाने से जुड़ी official details जल्द ही सदन में साझा की जाएंगी। उन्होंने संकेत दिया कि मंत्रिपरिषद और मुख्यमंत्री स्तर पर विचार-विमर्श के बाद निर्णय की जानकारी औपचारिक रूप से दी जाएगी।

सदन में गरमाई बहस, उठे कई अहम सवाल

नियम 105 के तहत हुई चर्चा में विपक्षी सदस्यों ने शिक्षामित्रों की स्थिति को गंभीर बताया। समाजवादी पार्टी के सदस्य डॉ. मान सिंह यादव ने कहा कि प्रदेश में लगभग 1.76 लाख शिक्षामित्र वर्षों से प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था का आधार बने हुए हैं। उन्होंने याद दिलाया कि पिछली सरकार के दौरान उनका समायोजन हुआ था और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की जिम्मेदारी उन्होंने कठिन परिस्थितियों में निभाई।

बहस के दौरान यह भी कहा गया कि जब नियमित शिक्षकों की कमी थी, तब शिक्षामित्रों ने कम संसाधनों में बच्चों को पढ़ाया। ऐसे में यदि पहले 35–40 हजार रुपये पाने वाले शिक्षामित्रों का मानदेय घटकर 10 हजार रुपये के आसपास रह जाए, तो असंतोष स्वाभाविक है। यह मुद्दा सिर्फ वेतन का नहीं, बल्कि सम्मान और भविष्य की सुरक्षा का भी है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद की स्थिति

सपा सदस्य आशुतोष सिन्हा ने जुलाई 2017 के उस फैसले का उल्लेख किया, जब Supreme Court of India ने शिक्षामित्रों का समायोजन निरस्त कर दिया था। उसके बाद से वे अस्थिर स्थिति में काम कर रहे हैं। उनका कहना था कि समान कार्य के लिए समान वेतन का सिद्धांत लागू किया जाए और आवश्यक हो तो अध्यादेश लाकर समाधान निकाला जाए।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि जो शिक्षामित्र टीईटी पास कर चुके हैं, उनकी eligibility के आधार पर प्राथमिकता तय की जा सकती है। इससे एक व्यवस्थित online process और पारदर्शी चयन प्रणाली विकसित की जा सकती है, जो भविष्य में विवादों से बचाए।

न्यूनतम वेतन से भी कम भुगतान का सवाल

चर्चा में यह मुद्दा भी उठा कि अक्टूबर 2025 से लागू अप्रेंटिस के नए न्यूनतम वेतन से भी कम राशि शिक्षामित्रों को मिल रही है। ऐसे में government benefits और सेवा शर्तों की समीक्षा की मांग तेज हो गई है। सदन में यह तर्क दिया गया कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में कार्यरत कर्मियों को स्थिर और सम्मानजनक पारिश्रमिक मिलना चाहिए।

सरकार का रुख क्या संकेत देता है?

राज्यमंत्री के बयान से यह स्पष्ट है कि मामला सिर्फ औपचारिक चर्चा तक सीमित नहीं है। यदि मंत्रिपरिषद स्तर पर निर्णय होता है, तो यह शिक्षामित्रों के लिए राहत भरा कदम साबित हो सकता है। हालांकि अभी तक कोई अंतिम official announcement नहीं हुआ है, लेकिन सरकार की संवेदनशीलता का आश्वासन उम्मीद जगाता है।

व्यवहारिक रूप से देखें तो प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में शिक्षामित्रों की भूमिका अहम रही है। ग्रामीण स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बनाए रखने से लेकर परीक्षा परिणाम सुधारने तक, उनका योगदान अक्सर चर्चा में कम आता है। ऐसे में मानदेय और सेवा शर्तों पर स्पष्ट important guidelines जारी होना समय की मांग है।

आगे क्या उम्मीद?

अब निगाहें सरकार के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं। यदि मानदेय वृद्धि या समायोजन से जुड़ा प्रस्ताव पास होता है, तो यह न केवल आर्थिक राहत देगा, बल्कि लंबे समय से चल रही अनिश्चितता भी खत्म करेगा।

निष्कर्ष

शिक्षामित्रों का मुद्दा केवल वेतन वृद्धि का विषय नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की स्थिरता और लाखों परिवारों की आजीविका से जुड़ा सवाल है। सदन में हुई चर्चा और सरकार के ताजा बयान से संकेत मिलते हैं कि समाधान की दिशा में कदम बढ़ सकते हैं। आने वाले दिनों में जारी होने वाली official details और संभावित निर्णय पर सभी की नजरें 

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