latest update:- इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त रुख: तीन माह में नियमितीकरण पर लें फैसला

latest update:- इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त रुख: तीन माह में नियमितीकरण पर लें फैसला

प्रयागराज से आई यह latest update उच्च शिक्षा विभाग से जुड़े कर्मचारियों के लिए अहम मानी जा रही है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहायक प्रोफेसर के नियमितीकरण के मामले में आदेश का पालन न होने पर नाराज़गी जताते हुए उच्च शिक्षा निदेशक को तीन माह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

यह मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे यह संकेत भी मिलता है कि अदालत अपने आदेशों के अनुपालन को लेकर कितनी गंभीर है।

क्या है पूरा मामला?

सुनवाई न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने की। याचिकाकर्ता डॉ. मदन गोपाल अग्रवाल ने अवमानना याचिका दायर कर बताया कि कोर्ट के पूर्व आदेश के बावजूद उनके नियमितीकरण के दावे पर तय समय में निर्णय नहीं लिया गया।

दरअसल, 17 सितंबर 2025 को पारित आदेश में हाईकोर्ट ने उच्च शिक्षा निदेशक को दो माह के भीतर याची के नियमितीकरण पर फैसला लेने के important guidelines दिए थे। लेकिन तय समय में कार्रवाई न होने पर मामला फिर कोर्ट पहुंचा।

किस कॉलेज से जुड़ा है विवाद?

यह प्रकरण हापुड़ के पिलखुवा स्थित आरएसएस (पीजी) कॉलेज पिलखुवा के रक्षा अध्ययन विभाग से जुड़ा है। यहां सहायक प्रोफेसर पद पर कार्यरत डॉ. अग्रवाल के नियमितीकरण को लेकर विवाद शुरू हुआ।

19 दिसंबर 2019 को उच्च शिक्षा निदेशक ने उनका दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि वे eligibility मानकों पर खरे नहीं उतरते। यह निर्णय उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग अधिनियम-1980 के तहत लिया गया था।

कोर्ट ने क्यों पलटा आदेश?

याची ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान संयुक्त निदेशक की ओर से पेश रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि डॉ. अग्रवाल 19 दिसंबर 2019 तक संस्थान में कार्यरत थे।

अदालत ने पाया कि पूर्व आदेश अभिलेखों के विपरीत था। इसे निरस्त करते हुए प्रकरण को दोबारा उच्च शिक्षा निदेशक को भेज दिया गया। साथ ही स्पष्ट निर्देश दिया गया कि तीन माह के भीतर इस पर अंतिम निर्णय लिया जाए।

यह कदम उन शिक्षकों के लिए उम्मीद की तरह देखा जा रहा है, जो वर्षों से नियमितीकरण के इंतजार में हैं। अक्सर देखा गया है कि administrative delay के कारण कई योग्य उम्मीदवारों को अपने अधिकारों के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है।

आगे क्या हो सकता है?

अब नजर इस बात पर रहेगी कि उच्च शिक्षा विभाग किस तरह से इस मामले में official details जारी करता है और क्या तय समयसीमा में निर्णय ले पाता है। यदि आदेश का पालन होता है तो यह अन्य लंबित मामलों के लिए भी एक सकारात्मक संकेत होगा।

नियमितीकरण जैसे मामलों में पारदर्शिता, स्पष्ट प्रक्रिया और समयबद्ध फैसला बेहद जरूरी है। अदालत का यह रुख बताता है कि सरकारी प्रक्रियाओं में देरी को अब हल्के में नहीं लिया जाएगा।

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