30 साल की सेवा के बाद ‘अयोग्यता’ का सवाल, दिल्ली में शिक्षकों का बड़ा विरोध, सेवा के बाद अब अग्निपरीक्षा?
राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में आज देशभर से आए सैकड़ों शिक्षकों ने अपनी मांगों को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। यह विरोध उन शिक्षकों की आवाज बनकर सामने आया है, जो वर्षों तक सेवा देने के बाद अब नई पात्रता शर्तों और परीक्षाओं को लेकर असमंजस में हैं। लंबे समय से पढ़ा रहे इन शिक्षकों का कहना है कि बदलते नियम उनके अनुभव को नजरअंदाज कर रहे हैं।
प्रदर्शन के दौरान का एक दृश्य खास तौर पर चर्चा में रहा। एक बुजुर्ग शिक्षक हाथ में तख्ती लिए शांत बैठे दिखाई दिए, लेकिन उनकी तख्ती पर लिखा संदेश काफी कुछ कह गया—“अनुभव को मिली ‘अयोग्यता’ की सजा! 30 साल की सेवा के बाद अब अग्निपरीक्षा?” उनके आसपास बैठे अन्य शिक्षक भी “न्याय दो” और “हमें इंसाफ चाहिए” जैसे नारों के साथ अपनी बात रख रहे थे। पूरे माहौल में एक तरह की निराशा और आक्रोश साफ महसूस किया जा सकता था।
दरअसल, इस विरोध का मुख्य कारण नई नीतियां हैं, जिनके तहत लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों से दोबारा पात्रता परीक्षा देने की अपेक्षा की जा रही है। शिक्षकों का कहना है कि उन्होंने 20 से 30 वर्षों तक ईमानदारी से काम किया है और अब उम्र के इस पड़ाव पर परीक्षा देना उनके लिए न सिर्फ मुश्किल है, बल्कि यह उनके अनुभव के साथ अन्याय जैसा लगता है।

प्रदर्शन में शामिल शिक्षकों ने साफ तौर पर अपनी मांगें रखीं। उनका कहना है कि अनुभवी शिक्षकों को ऐसी परीक्षाओं से छूट दी जानी चाहिए, उनकी सेवा अवधि और अनुभव को मान्यता मिलनी चाहिए और सबसे जरूरी, उनकी नौकरी की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। उनके अनुसार, अगर किसी व्यक्ति ने दशकों तक शिक्षा व्यवस्था को समय दिया है, तो उसकी योग्यता को बार-बार साबित करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
एक शिक्षक ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए कहा, “हमने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को पढ़ाने में लगा दी। अब हमें अयोग्य बताया जा रहा है, यह बहुत दुखद है।” यह बयान केवल एक व्यक्ति की भावना नहीं, बल्कि वहां मौजूद अधिकांश शिक्षकों की सोच को दर्शाता है।
फिलहाल, इस पूरे मामले पर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, विभागीय स्तर पर यह संकेत जरूर मिल रहे हैं कि शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए पात्रता मानकों को सख्ती से लागू किया जा रहा है। यही कारण है कि यह मुद्दा अब केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रह गया, बल्कि ‘अनुभव बनाम योग्यता’ की बड़ी बहस में बदलता जा रहा है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि आने वाले दिनों में सरकार और शिक्षकों के बीच इस टकराव का कोई समाधान निकलता है या नहीं। क्योंकि एक तरफ शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने की बात है, तो दूसरी तरफ उन लोगों का सम्मान भी जुड़ा है, जिन्होंने सालों तक इस व्यवस्था को संभाला है।